ज्ञान प्रवाह||Knowledge flow

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ज्ञान प्रवाह konwlege flow

सूरि नित्यानंद नंदन , तत्त्वचिंतक , पंन्यासप्रवर चिदानंद विजय जी म. के ज्ञानामृत से हिमांशु जैन लिगा द्वारा संग्रहित

वीतराग का स्वरुप

राग और द्वेष – आत्मा के 2 प्रमुख शत्रु हैं । इनको जीतने वाले को “वीतरागी” कहते हैं । वीतद्वेषी शब्द के बजाये वीतरागी शब्द आता है । इसके 2 कारण हैं –

१. द्वेष भी राग के कारण ही होता है । किसी से द्वेष है तो मतलब किसी से राग तो है ही है । अगर व्यक्ति राग को जीत लेता है तो द्वेष को स्वतः जीत ही लेता है ।
२. प्रायः द्वेष केवल चेतन (Living) के प्रति होता है जबकि राग जड़ (Non Living) और चेतन – दोनों के प्रति होता है । अतः उसे जीतना ज़्यादा मुश्किल है ।

इसलिए “वीतरागी” शब्द की महत्ता अधिक है । इन्हें सुदेव भी कहते हैं यानि अपनी देवलोक के देव नहीं बल्कि अपनी आत्मा की दिव्यता पाने वाले ।

तीर्थंकर परमात्मा के लिए विशेष कहा है –

प्रशमरसनिमग्नम् दृष्टियुग्मं प्रसन्नम् ,
वदनकमलं अंकः कामिनीसंगशून्यः ।
करयुगमपि यस्ये शस्त्रासम्बन्धवंध्यम् ,
तदसि जगति देवो वीतरागस्सुदेवः ।।

अर्थात् – जिनकी दोनों आँखें शांति रस में डूबी हुई हैं , जिनका मुख मण्डल हमेशा प्रसन्न रहता है , जिनके पास कभी कोई स्त्री नहीं रहती , जिनके दोनों हाथों में शस्त्र(हथियार) का कोई स्थान नहीं है , ऐसे वीतराग परमात्मा ही सुदेव हैं ।
वल्लभ वाटिका