उर्ध्व लोक वर्णन | Jain Khagol – sky

उर्ध्व लोक वर्णन | Jain Khagol – sky

उर्ध्व लोक वर्णन | Jain Khagol – sky

उर्ध्व लोक वर्णन | jain khagol
सुदर्शन मेरु पर्वत के शिखर की चोटी के एक बाल के skyअन्तर से प्रथम स्वर्ग ऋतु विमान हैं, वहीं से उर्ध्व लोक का प्रारंभ होता है।

स्वर्गों में दो दो युगल स्वर्ग अर्थात आठ जोड़ों या युगलों में सोलह स्वर्ग हैं, यों सब स्वर्ग विमानों में हैं, उर्ध्व लोक के कुल विमानों की संख्या चौरासी लाख सत्तानवें हजार तेईस हैं।

दो दो युगलों में सोलह स्वर्ग हैं, स्वर्गों के ऊपर नव ग्रैवियक हैं, तीन अध: ग्रैवियक हैं, तीन मध्य और तीन उर्ध्व ग्रैवियक हैं इस प्रकार नव ग्रैवियक एक एक से ऊपर हैं।

ग्रैवियकों के ऊपर नव अनुदिश हैं, उनमें एक बीच में और आठ चारों ओर दिशाओं और विदिशाओं में हैं। अनुदिश के ऊपर पांच अनुत्तर विमान हैं, एक बीच में और चार चारों ओर दिशाओं में हैं।

इस प्रकार उर्ध्व लोक की रचना हैं, इन सबके ऊपर मोक्ष शिला है, हे भव्य जीवों ! अब मैं इन सबके नाम क्रम से कहता हूं उसे ध्यान से सुनो।

स्वर्गों के नाम ??

सौधर्म, ईशान, सानत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्मा, ब्रह्माोत्तर, लान्तव, कापिष्ठ, शुक्र, महाशुक्र, शतार, सहस्रार, आनत, प्राणत, आरण और अच्युत इस प्रकार यें क्रम से सोलह स्वर्गों के नाम हैं। इन्हें कल्प भी कहते हैं कारण इन स्वर्ग के देवों में दश प्रकार के कल्प अर्थात भेद होते हैं, जिनका वर्णन आगे करेंगे ।

नव ग्रैवियक के नाम ??

सुदर्शन, अमोध, सुप्रबुद्ध, यशोधर, सुभद्र, ग्रैवियक, सुमनस, सोमनस और प्रीतिंकर इस प्रकार यें क्रम से नव ग्रैवियक एक एक के ऊपर हैं जिन्हें तीन अध:, तीन मध्य और तीन उर्ध्व ग्रैवियक कहते हैं।

नव अनुदिश के नाम ??

आदित्य, अर्ची, अर्चिमालिनी, वैर, वैरोचन, सोम, सोमरूप, अर्क, स्फाटिक इस प्रकार नव अनुदिश विमान एक ही पटल में स्थित हैं इनमें चार श्रेणिबद्ध हैं जो चारों दिशाओं में हैं और चार प्रकीर्णक हैं जो चार विदिशाओं में हैं, और एक इन्द्रक है जो कि सबके बीच में हैं।

पांच अनुत्तर के नाम ??

पांच अनुत्तर विमान निम्न प्रकार हैं :
विजय, वैजयंत, जयंत, अपराजित और सर्वार्थसिद्धि।

चार चारों दिशाओं में और सबके बीच में सबसे ऊँचा सर्वार्थसिद्धि विमान हैं। यह सर्वार्थसिद्धि का विमान और सातवें नरक का इन्द्रक बिल और जम्बूद्वीप यें तीनों बराबर बराबर एक लक्ष या लाख योजन के विस्तार के हैं।

सर्वार्थसिद्धि के विमान से बारह योजन ऊँची ईषत्प्राग्भार नाम की आठवीं पृथ्वी है, उसके बीच में पैंतालिस लाख योजन के विस्तार में सिद्ध शिला है, उस सिद्ध शिला पर अनंत सिद्ध भगवान विराजमान है।

इस प्रकार उर्ध्व लोक की अत्यंत महिमा हैं उस उर्ध्व लोक में देव, इन्द्र और अहमिन्द्र रहते हैं, वहाँ के पटल और विमान वगैरह का वर्णन यहाँ करता हूं।

उर्ध्व लोक में त्रेसठ 63 पटल हैं, नव ग्रैवियक में नव पटल हैं।

अब देवों के विमानों का वर्णन सुनिए।

स्वर्ग विमान वर्णन ?

स्वर्गों में विमान होते हैं इसीलिए स्वर्ग के देव वैमानिक कहलाते हैं यें विमान देवों को बहुत आराम और सुख देने वाले इन्द्रक, श्रेणिबद्ध और प्रकीर्णक कहे जाते हैं।

कुल विमान चौरासी लाख सत्तानवें हजार तेईस की संख्या में हैं। प्रत्येक विमान में एक एक जिनालय है, इनकी संख्या भी विमानों के समान हैं।

पहले स्वर्ग में बत्तीस लाख विमान, दूसरे स्वर्ग में अठाईस लाख, तीसरे स्वर्ग में बारह लाख, चौथे स्वर्ग में आठ लाख, पांचवें – छठवें स्वर्ग में चार लाख, सातवें – आठवें स्वर्ग में पचास हजार, नवमें – दशवें स्वर्ग में चालीस हजार, ग्याहरवें – बारहवें स्वर्ग में, तेरहवें स्वर्ग से सोलहवें स्वर्ग तक सात सौ विमान हैं। तीन अध: ग्रैवियक में एक सौ ग्यारह विमान, तीन मध्य ग्रैवियक में एक सौ सात विमान और तीन उर्ध्व ग्रैवियक में इक्यावन विमान हैं। नव अनुदिश में नव विमान और पांच अनुत्तर में पांच विमान हैं इस प्रकार उर्ध्व लोक में स्वर्ग के विमानों की संख्या हैं जिनमें देवगण रहते हैं।

विमानों का विशेष वर्णन ♻

पटल के बीच में विमान इन्द्रक कहा जाता हैं और चारों दिशाओं और विदिशाओं में जो विमान होते हैं वें श्रेणीबद्ध कहलाते हैं, और दिशाओं और विदिशाओं के बीच अन्तराल में जो विमान स्थित हैं उन्हें प्रकीर्णक कहते हैं।

देव विमानों में सोने के रत्नमयी महल होते हैं उन महलों में मरकतमणि और इन्द्रनीलमणि के तोरणों से युक्त दरवाजे हैं। यें विमान सात, आठ, नव, दश भूमियों से युक्त होते हैं, तथा विमानों में बड़ी बड़ी नाट्यशालाएं होती है। विमानों में आसनशाला, क्रीड़ाशाला, मणिमय शय्याएं, निर्मल एवं उत्तम दीपों व विविध पुष्पों से परिपूर्ण महल होते हैं।

सौधर्म आदि स्वर्गों के मुख्य मुख्य विमानों के कुछ नाम निम्न प्रकार हैं ऋतु, सौमनस, श्रीवृक्ष, सर्वतोभद्र, प्रीतिकंर, रम्यक, लक्ष्मी, मान्दिति नाम है। यें विमान लाख लाख योजन के विस्तार के होते हैं। इन देव विमानों के बीच में इन्द्र का रत्नमयी महल होता है, इस महल में मणिमय सिंहासन होता है, उस पर इन्द्र बैठता हैं।

देव और देवियाँ इन्द्र की नित्य सेवा करती हैं सौधर्म और ईशान इन्द्र के कुल एक लाख और साठ हजार देवियाँ और आठ आठ अग्रदेवियाँ होती है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक इन्द्र के एक एक प्रतीन्द्र और अन्य देवगण इन्द्र की आज्ञा में रहते हैं।

इन्द्र के प्रासादों के चारों दिशाओं में देवियों के स्वर्णमयी प्रासाद होते हैं, उनमें इन्द्र की वल्लभाएं और देवागंनाएं रहती हैं। इन्द्र के महल के आगे सुन्दर न्यग्रोध जाति के वृक्ष होते हैं जो कि जम्बू वृक्ष के समान पार्थिव होते हैं, उन वृक्षों के तल में चारों दिशाओं में जिन प्रतिमाएँ विराजमान होती है।

नगर वर्णन ?

स्वर्गों में अकृत्रिम अनादि निधन नगर हैं उनकी संख्या आगम में कही है, ये नगर कम ज्यादा नही होते।

पहले स्वर्ग में चौरासी हजार, दूसरे स्वर्ग में अस्सी हजार, तीसरे स्वर्ग में बहत्तर हजार, चौथे स्वर्ग में सत्तर हजार, पांचवें – छठवें स्वर्ग में साठ हजार, सातवें -आठवें स्वर्ग में पचास हजार, नवमें – दशवें स्वर्ग में चालीस हजार, ग्याहरवें – बारहवें स्वर्ग में तीस हजार तथा तेरहवें स्वर्ग से सोलहवें स्वर्ग तक एक – एक स्वर्ग में बीस बीस हजार नगर हैं।

? मानस्तंभ वर्णन ?

सौधर्म स्वर्ग से चौथे माहेन्द्र स्वर्ग तक इन चार स्वर्गों में बड़े सुंदर मानस्तंभ है, उन मानस्तंभों में तीर्थंकरों के वस्त्र व आभूषण रखने के रत्नमयी सुंदर पिटारे होते हैं।

पहले स्वर्ग के मानस्तंभ में भरत क्षेत्र के तीर्थंकरों के वस्त्राभूषण होते हैं, दूसरे स्वर्ग के मानस्तंभ में ऐरावत क्षेत्र के तीर्थंकरों के वस्त्राभूषण होते हैं, तीसरे स्वर्ग के मानस्तंभ में पूर्व विदेह के तीर्थंकरों के वस्त्राभूषण होते हैं और चौथे स्वर्ग के मानस्तंभ में पश्चिम विदेह के तीर्थंकरों के वस्त्राभूषण होते हैं।

मानस्तंभों में रत्नों के पिटारे में यें वस्त्राभूषण सुरक्षित रहते हैं, इन्द्र तीर्थंकरों के जन्माभिषेक को समय सुमेरु पर्वत पर बड़े हर्ष से जिनेन्द्र बालक को पहनाता है।

मानस्तंभ के पास सुंदर रत्नमयी उपपाद शैय्या है जिन पर इन्द्र का उपपाद जन्म होता है।

उसके पास में बड़े ऊँचे भव्य शिखर युक्त जिन मंदिर होता है, जिनमें रत्नमयी दिव्य वीतराग मुद्रा वाली जिन प्रतिमा सुशोभित होती हैं।

स्वर्गों की समस्त देवागंनाएं पहले व दूसरे स्वर्ग में ही जन्म प्राप्त करती हैं, अपने अपने स्वर्ग के देव व इन्द्र अपनी अपनी देवागंनाओं को विमानों में ले जाते हैं।

बिना देवों के केवल देवागंनाओं वाले विमान पहले स्वर्ग में छ: लाख और दूसरे स्वर्ग में चार लाख हैं तथा जिनमें देव और देवागंनाएं दोनों रहती हैं उन विमानों की संख्या पहले स्वर्ग में छब्बीस लाख और दूसरे स्वर्ग में चौबीस लाख हैं।

देवों के दश भेद वर्णन ?

चारों प्रकार के देवों के दश दश भेद हैं उनके नाम जो कि सुनने में सुखकर हैं, ??निम्न प्रकार हैं :
१.इन्द्र, २.सामानिक, ३.त्रायस्त्रिंश, ४.पारिषद्, ५.आत्मरक्ष, ६.लोकपाल, ७.अनीक, ८.प्रकीर्णक, ९.आभियोग्य, १०. किल्विषक, इस प्रकार यें दश भेद होते हैं।

इनमें व्यन्तर और ज्योतिष्क देवों के त्रासस्त्रिंश और लोकपाल यें दो भेद नही होते, इसलिए इनके आठ भेद कहे गए हैं, इन सबमें इन्द्र प्रधान होता है।

जिस प्रकार मनुष्य लोक में राजा सबसे बड़ा होता है उसी प्रकार इन्द्रसभा में सबसे ऊँचे आसन पर बैठने वाला इन्द्र होता है, सब देव जिसकी आज्ञा मानते हैं वह इन्द्र कहलाता है। सौधर्म स्वर्ग की सभा का नाम सुधर्मा हैं।

जो राजा के समान सुख भोगता है, जिसकी आज्ञा देवगण मानते हैं तथा जो अन्य देवों में असाधारण अणिमादि गुणों के संबंध से शोभते हैं, वें इन्द्र कहलाते हैं।

जो इन्द्र के समान होता है, माता – पिता के समान जिनका आदर होता है वें देव सामानिक देव कहलाते हैं।

जो मंत्री और पुरोहित के समान हैं, वें त्रासस्त्रिंश कहलाते हैं। यें तेंतीस ही होते हैं इसीलिए वें त्रायस्त्रिंश कहलाते हैं।

जो सभा में मित्र और प्रेमीजनों के समान होते हैं, वें पारिषद् कहलाते हैं।

जो अंगरक्षक के समान हैं, वें आत्मरक्षक कहलाते हैं।

कोतवाल के समान देव या जो लोक का पालन करते हैं, वें लोकपाल कहलाते हैं।

सेना के समान देव, जैसे यहाँ सेना है उसी प्रकार सात प्रकार के पदाति आदि अनीक कहलाते हैं।

जो गाँव और शहरों में रहने वालों के समान हैं, उन्हें प्रकीर्णक कहते हैं।

जो दास के समान वाहन आदि कर्म में प्रवृत्त होते हैं, वें आभियोग्य कहलाते हैं।

चाण्डाल की तरह के देव किल्विषक कहलाते हैं। जो सीमा के पास रहने वालों के समान हैं, वें किल्विषक कहलाते हैं। किल्विष पाप को कहते हैं। इसकी जिनके बहुलता होती हैं, वें किल्विषक कहलाते हैं।
इस प्रकार देवों के दश भेद होते हैं, स्वर्ग से ऊपर ग्रैवियक आदि में सब देव समान होते हैं उनमें कोई भेद नही होता है, इसलिए वें अहमिन्द्र कहलाते हैं।

स्वर्गों में हीनाधिकता

स्वर्ग के देवों में सुख, कांति, लेश्याविशुद्धि व इन्द्रियों के विषय और अवधि ज्ञान का विषय नीचे वाले देवों से ऊपर के देवों में अधिक होता है और गति, शरीर और परिग्रह अभिमान में ऊपर – ऊपर हीनता होती हैं।

स्वर्गों में इन्द्रों का वर्णन ?

सोलह स्वर्गों में बारह इन्द्र होते हैं, प्रथम स्वर्ग से चौथे स्वर्ग अर्थात प्रारंभ के चार स्वर्गों में एक एक इन्द्र होता है, पांचवें – छठवें इन दो स्वर्गों में एक इन्द्र होता है, सातवें -आठवें, नौवें – दशवें, ग्याहरवें – बारहवें स्वर्गों में इन दो दो स्वर्गों में एक एक इन्द्र होता है। तेरहवें स्वर्ग से लेकर सोलहवें स्वर्ग तक प्रत्येक में एक एक इन्द्र होता है। इस प्रकार सोलह स्वर्गों में बारह इन्द्र होते हैं।

इन बारह इन्द्रों में छ: तो दक्षिणेन्द्र और छ: उत्तरेन्द्र होते हैं, सौधर्मेन्द्र, सानत्कुमार, ब्रह्मा, लान्तव, आनत और आरण यें छ: दक्षिणेन्द्र और शेष छ: उत्तरेन्द्र हैं। बारह इन्द्र और बारह उपेन्द्र हैं। स्वर्गों के देव कल्पवासी और ऊपर के देव कल्पातीत कहलाते हैं।

स्वर्ग के ऊपर नव ग्रैवियक, नव अनुदिश, पांच अनुत्तर विमानों के देव अहमिन्द्र कहलाते हैं। उनके वहां देवागंनाएं नही होती, सब समान होते हैं। अपने अपने विमानों को छोड़कर वें अन्यत्र कहीं नहीं जाते। वें बहुत काल तक पूर्व भव में बँधे हुए पुण्य को भोगते हैं। जो मनुष्य पर्याय में मुनि होकर महान तप करते हैं वें ही वहां जन्म लेते हैं।

स्वर्गों में लेश्या का वर्णन

पहले – दूसरे स्वर्ग के देवों में पीत लेश्या, तीसरे – चौथे में पीत – पद्म, पांचवें से आठवें तक पद्म लेश्या, नवमें से बारहवें स्वर्ग तक पद्म और शुक्ल लेश्या, तेरहवें स्वर्ग से नव ग्रैवियक तक शुक्ल लेश्या तथा अनुदिश और अनुत्तर विमानों में परम शुक्ल लेश्या कही गयी है, इस प्रकार उर्ध्व लोक के देवों की भाव लेश्या जिनागम में वर्णित हैं।

स्वर्ग में देवों की उत्कृष्ट आयु का वर्णन

पहले व दूसरे के देवों की उत्कृष्ट आयु दो सागर से कुछ अधिक, तीसरे चौथे स्वर्ग के देवों की उत्कृष्ट आयु सात सागर से कुछ अधिक, पांचवें छठवें स्वर्ग के देवों की उत्कृष्ट आयु दश सागर से कुछ अधिक, सातवें आठवें स्वर्ग के देवों की उत्कृष्ट आयु चौदह सागर, नवमें दशवें स्वर्ग के देवों की उत्कृष्ट आयु सोलह सागर, ग्याहरवें बारहवें स्वर्ग के देवों की उत्कृष्ट आयु अठारह सागर, तेरहवें चौदहवें स्वर्ग के देवों की उत्कृष्ट आयु बीस सागर, पन्द्रहवें और सोलहवें स्वर्ग के देवों की उत्कृष्ट आयु बाईस सागर की है।

इनसे ऊपर नौ ग्रैवियक में उत्कृष्ट आयु क्रम से एक एक सागर की उत्कृष्ट आयु है। जैसे : प्रथम ग्रैवियक में तेईस सागर की व अंतिम नवमें ग्रैवियक में एक एक सागर बढ़ाते हुए इकतीस सागर की आयु है।

नव अनुदिशों में बत्तीस सागर और पांच अनुत्तर विमानों में तैंतीस सागर की उत्कृष्ट आयु है। इस प्रकार उर्ध्व लोक के देवों की उत्कृष्ट आयु जिनेन्द्र देव ने कही है।

स्वर्ग में देवों की जघन्य आयु का वर्णन ?

पहले व दूसरे स्वर्ग की जघन्य आयु एक पल्य, तीसरे चौथे स्वर्ग की जघन्य आयु दो सागर, पांचवें छठवें स्वर्ग की जघन्य आयु सात सागर, सातवें आठवें स्वर्ग की जघन्य आयु दस सागर, नवमें दसवें स्वर्ग की जघन्य आयु चौदह सागर, ग्यारहवें बारहवें स्वर्ग की जघन्य आयु सोलह सागर, तेरहवें चौदहवें स्वर्ग की जघन्य आयु अठारह सागर, पन्द्रहवें सोलहवें स्वर्ग की जघन्य आयु बीस सागर की होती है।

प्रथम ग्रैवियक की जघन्य आयु बाईस सागर, दूसरे ग्रैवियक की जघन्य आयु तेईस सागर, तीसरे ग्रैवियक की जघन्य आयु चौबीस सागर, चौथे ग्रैवियक की जघन्य आयु पच्चीस सागर, पांचवें ग्रैवियक की जघन्य आयु छब्बीस सागर, छठे ग्रैवियक की जघन्य आयु सत्ताईस सागर, सातवें ग्रैवियक की जघन्य आयु अठ्ठाईस सागर, आठवें ग्रैवियक की जघन्य आयु उनतीस सागर, नवमें ग्रैवियक की जघन्य आयु तीस सागर की होती है।

नव अनुदिशों में जघन्य आयु इकतीस सागर हैं।
कहीं कहीं बत्तीस सागर भी कहा हैं ।

पांच अनुत्तर विमानों में जघन्य आयु और उत्कृष्ट आयु तैंतीस सागर कही है और कहीं कहीं बत्तीस सागर कही है ।

देवों में आहार का समय ?

जिन देवों की एक सागर की आयु है उनका एक हजार वर्ष में एक बार दिव्य अमृतमय मानसिक आहार होता है।
जिन जिन देवों की जितने सागर की आयु है उतने उतने हजार वर्षों में उनका आहार होता है। देवों के आहार का यह नियम है।

इन्द्रों की सेना व परिवार वर्णन ?

इन्द्र के वृषभ, तुरगंम, रथ, गज, पदाति, गंधर्व, नर्तक अर्थात बैल, घोड़े, रथ, हाथी, पैदल, गाने वाले और नृत्य करने वाले ऐसे सात प्रकार की सेना वाले देव होते हैं इन्हें अनीक देव कहते हैं।

इस प्रकार सात सात प्रकार की सेना प्रत्येक इन्द्र की होती है। सौधर्म इन्द्र के एक करोड़ छ: लाख अड़सठ हजार बैल होते हैं, और इतने ही संख्या में तुरंग ( घोड़े ) आदि अन्य सेनाएँ होते हैं।

इन्द्रों की देवागंनाओं का वर्णन ?

सौधर्म और ईशान इन्द्र के एक एक ज्येष्ठ देवी अर्थात प्रधान शची होती है और अत्यन्त सुंदर सोलह सोलह हजार पारिवारिक देवियाँ होती है। सानत्कुमार इन्द्र के आठ हजार देवियाँ और माहेन्द्र स्वर्ग के चार हजार, ब्रह्मेन्द्र के दो हजार, तथा लांतवेन्द्र और महाशुक्र इन्द्र के एक एक हजार पारिवारिक देवियाँ होती हैं। सहस्रार इन्द्र के पाँच सौ और आनत, प्राणत, आरण और अच्युत इन चार इन्द्रों के ढ़ाई सौ ढ़ाई सौ पारिवारिक देवियाँ होती हैं।

वल्लभाओं का वर्णन ?

प्रथम और द्वितीय स्वर्ग सौधर्म और ईशान इन्द्र के बत्तीस हजार वल्लभाएं होती हैं। सानत्कुमार और माहेन्द्र इन्द्र के आठ हजार वल्लभाएं होती हैं। ब्रह्मेन्द्र के दो हजार, लांतवेन्द्र के पाँच सौ,महाशुक्र के ढ़ाई सौ तथा सहस्रार इन्द्र के सौ पच्चीस वल्लभाएं होती हैं। आनत, प्राणत, आरण और अच्युत इन चार इन्द्रों के त्रेसठ त्रेसठ वल्लभाएं होती हैं इस प्रकार की वल्लभाओं की संख्या का प्रमाण हैं।

देवों के मुकुट चिन्ह वर्णन ?

सौधर्म आदि स्वर्गों के इन्द्र और देवों के नौ प्रकार के चिन्ह होते हैं उनके नाम हैं — सुअर, हिरण, भैंसा, मछली, मेंढक, छागला, बैल, कल्पवृक्ष आदि यथाक्रम से देवों के मुकुट पर यें चिन्ह होते हैं यें मुकुट रत्न और मणियों के बने होते हैं, इन मुकुट चिन्हों से इन्द्रों की पहचान होती हैं।

कल्पातीत देवों का वर्णन ?

स्वर्गों से ऊपर के जो नव ग्रैवियक, नौ अनुदिश और पाँच अनुत्तर विमानों में रहने वाले सब देव अहमिन्द्र कहलाते हैं। उनमें किसी प्रकार की विषमता नही होती सब देव समान होते हैं। अहमिन्द्रों के भी सुंदर सुंदर विमान होते हैं वें सभाओं, गीतशालाओं, चैत्यवृक्षों से युक्त व बड़े आश्चर्यकारी रमणीय महलों से युक्त होते हैं।

उन विमानों की ऊँचाई तीन अध:ग्रैवियक में दो सौ योजन तथा मध्य तीन ग्रैवियक में डेढ़ सौ योजन ऊँचे विमान होते हैं। नव अनुदिश और पाँच अनुत्तर विमानों की ऊँचाई क्रम से पचास और पच्चीस योजन है।

अवधि ज्ञान का क्षेत्र ?

स्वर्गों में पहले और दूसरे अवधि ज्ञान का क्षेत्र पहले नरक, तीसरे चौथे स्वर्ग के देवों का अवधिज्ञान का क्षेत्र दूसरे नरक, पाँचवें स्वर्ग से आठवें इन चार स्वर्ग के देवों का अवधिज्ञान का क्षेत्र, नवमें से बारहवें स्वर्ग तक के देवों का अवधिज्ञान का क्षेत्र चौथे नरक तक, तेरहवें और सोलहवें स्वर्ग के देवों का अवधिज्ञान का क्षेत्र पाँचवें नरक तक हैं, नौ ग्रैवियक के देवों का अवधिज्ञान का क्षेत्र छठवें नरक तक और नौ अनुदिश के देवों का अवधिज्ञान का क्षेत्र सातवें नरक होता है। पाँच अनुत्तर विमानों के देवों का अवधिज्ञान का क्षेत्र चौदह राजू प्रमाण त्रस नाली पूर्ण तक होता है।

स्वर्गों की देवागंनाओं की आयु ?

स्वर्ग के छ: दक्षिणेन्द्र जो कि एक भवावतारी होते हैं उनकी देवागंनाओं की उत्कृष्ट आयु क्रम से पांच, नौ, तेरह, सत्रह, चौंतीस तथा अड़तालीस पल्य की है तथा छ: उत्तरेन्द्र की देवागंनाओं की उत्कृष्ट आयु क्रम से सात, ग्यारह, तेईस, सत्ताईस, इकतालीस और पचपन पल्य की जिनेन्द्र भगवान ने कही है।

देवों में गुणस्थान आदि का वर्णन

देवों में प्रारंभ के प्रथम गुणस्थान से लेकर चार गुणस्थान होते हैं, पर्याप्तियां छहों होती है, प्राण दश, संज्ञायें चार, इन्दिय पांच, त्रस काय, योग ग्यारह, वेद दो, दर्शन तीन, ज्ञान छ: इस प्रकार कुछ वर्णन यहाँ मैंने किया है, इनका विस्तृत वर्णन जिनागम से जानना चाहिए। प्रखर जैन भोपाल